الحاج هاشم الكعبي
|
لو كان في الربع
المحيل |
|
برء العليل من
الغليل |
|
ربع الشباب
ومنزل |
|
الأحباب والظل
الظليل |
|
لعب الشمال به
كما |
|
لعبت شمول
بالعقول |
|
طلل يضيف
النازلين |
|
شجاؤه قبل
النزول |
|
مستأنساً بالوحش
بعد |
|
أوانس الحي
الحلول |
|
مستبدلا ربما
بريم |
|
آخذ غيلا بغيل |
|
لا يقتضي عذرا
ولا |
|
يرتاع من عذل
العذول |
|
ومريعة باللوم
تلحوني |
|
وما تدري ذهولي |
|
خلي أميمة عن
ملامك |
|
ما المعزي
كالثكول |
|
ما الراقد
الوسنان مثل |
|
معذب القلب
العليل |
|
سهران من ألم
وهذا |
|
نائم الليل
الطويل |
|
ذوقي أميمة ما
أذوق |
|
وبعده ما شئت
قولي |
|
أو من علمت
الماجدين |
|
غداة جدوا
بالرحيل |
|
آل الرسول ونعم
أكفاء |
|
العلى آل الرسول |
|
خير الفروع
فروعهم |
|
وأصولهم خير
الأصول |
|
ومهابط الأملاك
تترى |
|
بالبكور
وبالأصيل |
٢١٣
![أدب الطّف أو شعراء الحسين عليه السلام [ ج ٦ ] أدب الطّف أو شعراء الحسين عليه السلام](/_next/image?url=https%3A%2F%2Flib.rafed.net%2FBooks%2F373_adab-altaff-06%2Fimages%2Fcover-big.jpg&w=640&q=75)

