أستاذي أبو الفرج الحسين بن محمّد المستور هذه القصيدة له بدمشق سنة خمس وثمانين وثلاثمائة (١) :
|
الحبّ بحر زاخر |
|
راكبه مخاطر |
|
جنوده المحاجر |
|
والحدق السّواحر |
|
ركبته على غرر |
|
وخطر من (٢) الخطر |
|
في واضح يحكي القمر |
|
وكان حتفي في النّظر |
|
حلّفته لما بدا |
|
كغصن غبّ (٣) ندا |
|
ريّان بالنور ارتدا |
|
بالحسن ظل مفردا (٤) |
|
بحق بيت المقدس |
|
والبلد المقدّس |
|
وبالتي لم تدنس |
|
لا تك منك مؤيسي |
|
بحقّ قدس مريم |
|
والبلد (٥) المعظّم |
|
بعادل لم يظلم |
|
جد (٦) لفتى متيّم |
|
بالدّير بالرهبان |
|
بحرمة القربان |
|
بمنزل (٧) القرآن |
|
كن حسن الإحسان |
|
بالطّور بالزّبور |
|
بساكن القبور |
|
من شاهد مشهور (٨) |
|
اعطف على المهجور |
|
بحرمة المسيح |
|
وبالفتى الذّبيح |
|
بالفسح بالتسبيح |
|
بقّ عليّ روحي |
|
بليلة الميلاد |
|
وحرمة الأعياد |
__________________
(١) الأبيات في معجم البلدان ١٠ / ١٦٤ ـ ١٦٦.
(٢) معجم البلدان : على خطر.
(٣) أي عقب.
(٤) مكانه في معجم البلدان : وبالبها تفرّدا.
(٥) معجم البلدان : وبطرس المعظّم.
(٦) معجم البلدان : دق لصبّ مغرم.
(٧) مكانه في معجم البلدان : ببولص ذي الشأن.
(٨) بالأصل : «مشهود» والمثبت عن معجم البلدان.
![تاريخ مدينة دمشق [ ج ١٤ ] تاريخ مدينة دمشق](/_next/image?url=https%3A%2F%2Flib.rafed.net%2FBooks%2F1790_tarikh-madina-damishq-14%2Fimages%2Fcover.jpg&w=640&q=75)
