|
يا طف طاف على
مقامك |
|
كل هتان هطول |
|
وأناخ فيك من
السحاب |
|
الغر مثقلة
الحمول |
|
وحباك من مر
النسيم |
|
بكل خفاق عليل |
|
أرج يضوع كأنه |
|
قد بل بالمسك
البليل |
|
حتى ترى خضر |
|
المرابع
والمراتع والفصول |
|
كاسي الروابي
والبطاح |
|
مطارفا هدل
الذيول |
|
قسما بتربة ساكنيك |
|
وما بضمنك من
قتيل |
|
أنا ذلك الظامي
وصاحب |
|
ذلك الدمع
الهطول |
|
لا بعد ينسيني
ولا |
|
قرب يبرد لي
غليلي |
|
يا خير من لاذ
القربض |
|
بظل فخرهم
الظليل |
|
وأجل مسؤول أتاه |
|
فنال عاف خير
سول |
|
لكم المساعي
الغر |
|
والعلياء لامعة
الحجول |
|
والمكرمات وما
أشاد |
|
الدهر من ذكر
جميل |
|
وجميع ما قال
الأنام |
|
وما تسامى من
مقول |
|
والمدح في أم
الكتاب |
|
وما أتى عن
جبرئيل |
|
وثناي أقصر قاصر |
|
وأقل شيء من
قليل |
|
والعجز ذنبي لا
عدو |
|
لي عن أخ البر
الوصول |
|
وأنا المقصر كيف
كنت |
|
فهل لعذر من
قبول |
|
وأرى الكمال بكم
فمدح |
|
الفاضلين من
الفضول |
|
صلى الإله عليكم |
|
ما جد ركب في
رحيل |
![أدب الطّف أو شعراء الحسين عليه السلام [ ج ٦ ] أدب الطّف أو شعراء الحسين عليه السلام](/_next/image?url=https%3A%2F%2Flib.rafed.net%2FBooks%2F373_adab-altaff-06%2Fimages%2Fcover-big.jpg&w=640&q=75)

