|
أو خال مستنّ
النزال حديقة |
|
من جلنار والدما
أنهارها |
|
ويرى صليل
المرهفات غوانيا |
|
أمست تحرك للغنا
أوتارها |
|
وكأنما السمر
الكعاب كواعبٌ |
|
رقصت لديه ورددت
أشعارها |
|
أو أنها أغصان
بانٍ هزّها |
|
مرّ النسيم
فأطربت أطيارها |
|
لو شاء ما أبقى
من الأعداء ديا |
|
راً وعَفى
الحسام ديارها |
|
لكن تجلت هيبة
الباري له |
|
فهوى كليماً حين
آنس نارها |
|
ورأى المنية مذ
أتته هي المنى |
|
كالصب شام من
الدُما معطارها |
|
فهوى على حرّ
الظهيرة بالعرا |
|
واري الحشا
وظماه زاد أوارها |
|
لم تروَ غلّة
صدره لكنما الا |
|
سياف روت من
دماه شفارها |
|
الله أكبر يا
لها من نكبة |
|
فقماءَ لم تنسَ
الورى تذكارها |
|
الله أكبر يا
لها من وقعة |
|
قدحت بأحناء
الضلوع شرارها |
|
أيبيت سرّ الكون
عارٍ والعدى |
|
في كربلا أجرت
عليه مهارها |
|
رضّت صدور بني
النبي وصيّرت |
|
ظلماً على صدر
الحسين مغارها |
|
صدرٌ به علم
الامامة مودع |
|
وبه النبوة
أودعت أسرارها |
|
صدر تربّى فوق
صدر محمد |
|
تخذته خيل امية
مضمارها |
|
وودايع الرحمن
صيح برحلها |
|
نهباً ولم ترع
الطغاة ذمارها |
|
فتناهبت نوب
الدهور فؤادها |
|
وأكفّ شاربة
الخمور خمارها |
|
برزت بعين الله
تندب ندبها |
|
بمدامع يحكي
الحيا مدرارها |
|
وغدت تشوط
لهولها مذعورة |
|
مثل الحمائم
ضيعت أوكارها |
|
ودنت إلى نحو
الغري ونادت ال |
|
كرار فارس هاشم
مغوارها |
|
حامي الحمى طلاع
كل ثنية |
|
مقدام كل كريهة
مسعارها |
|
هذا حبيبك
بالتراب معفر |
|
فيه المنية
أنشبت أظفارها |
|
وكرائم التنزيل
أضحت كالإما |
|
حسرى تطوف بها
العدا أمصارها |
![أدب الطّف أو شعراء الحسين عليه السلام [ ج ٨ ] أدب الطّف أو شعراء الحسين عليه السلام](/_next/image?url=https%3A%2F%2Flib.rafed.net%2FBooks%2F379_adab-altaff-08%2Fimages%2Fcover-big.jpg&w=640&q=75)

