|
نفسي الفداء
لاسرة قد أرخصت |
|
دون ابن بنت
نبيها أعمارها |
|
ولفتية مضرية
حمت العلى |
|
فقضت وما صبغ
المشيب عذارها |
|
صامت بيوم الطف
لكن صيّرت |
|
عصب الضلالة
بالدما إفطارها |
|
ما جاءها الموت
الزؤام مقطباً |
|
إلا رثى بوجوهها
استبشارها |
|
صيدٌ إذا اشتبكت
أنابيب القنا |
|
وأطارت البيض
الرقاق شرارها |
|
والخيل تعثر
بالجماجم والشوى |
|
والصيد رعباً
أشخصت أبصارها |
|
هزوا الردينيات
حتى حطّموا |
|
بحشى الكماة
طوالها وقصارها |
|
حيث الظبا ترمي
العدا جمراً كما |
|
بمنى رمت زمر
الحجيج جمارها |
|
خطبوا لبيضهم
النفوس وصيّروا |
|
الاعمار مهراً
والرؤس نثارها |
|
غرسوا الصوارم
بالطلى لكنما |
|
في جنة المأوى
جنت أثمارها |
|
ودعاهم داعي
القضا لمراتب |
|
قد شاءها الباري
لهم واختارها |
|
ركبوا مناياهم
ففازوا بالمنى |
|
أبداً وحازوا
عزها وفخارها |
|
وهووا على وجه
الثرى ونفوسهم |
|
عرجت إذ الباري
أحبّ جوارها |
|
ثاوين تحسب أنهم
صرعى وهم |
|
بجنان عدن
عانقوا أبكارها |
|
وغدا فريد المجد
ما بين العدى |
|
فرداً يوبّخ
ناصحاً أشرارها |
|
فهناك هزّ من
الوشيج مثقفاً |
|
واستلّ من البيض
الظبا بتارها |
|
ماضي المضارب ما
اكفهرت غارة |
|
إلا تألق ومضه
فأنارها |
|
ضاق الفضا حتى
انتضى ابن المرتضى |
|
عضباً به لولا
القضا لأبارها |
|
وسطا فقل بالليث
أصحَر طاوياً |
|
والصقر شدّ على
القطا فأطارها |
|
يطفو ويرسب
بالالوف بسيفه |
|
ويخوض من لجج
الحتوف غمارها |
|
غيران ثقّف
بالمثقف أضلعاً |
|
منها وقدّ بذي
الفقار فقارها |
|
إن كرّ فرّت منه
خيفة بأسه |
|
والخوف يمزج
بالعثار فرارها |
|
فكأنه تخذ
الكريهة روضة |
|
تزهو ونقع
الصافنات غرارها |
![أدب الطّف أو شعراء الحسين عليه السلام [ ج ٨ ] أدب الطّف أو شعراء الحسين عليه السلام](/_next/image?url=https%3A%2F%2Flib.rafed.net%2FBooks%2F379_adab-altaff-08%2Fimages%2Fcover-big.jpg&w=640&q=75)

