السيد جواد الهندي
المتوفى ١٣٣٣
|
رحلتم وما بيننا
موعد |
|
وإثركم قلبيَ
المكمد |
|
وبتّ بداري غريب
الديار |
|
فلا مونس لي ولا
مسعد |
|
وفارق طرفيَ طيب
الرقاد |
|
وفي سهده يشهد
المرقد |
|
أُعللّه نظرة في
النجوم |
|
وشهب النجوم له
تشهد |
|
أقوم اشتياقاً
لكم تارة |
|
واخرى على بعدكم
أقعد |
|
بكفي اكفكف دمعي
الغزير |
|
فيرسله طرفي
الأرمد |
|
يطارح بالنوح
ورق الحمام |
|
بتذكاركم قلبي
المنشد |
|
وما كان ينشد من
قبلكم |
|
فقيداً فلا
والذي يعبد |
|
سوى من بقلبي له
مضجع |
|
ومن بالطفوف له
مشهد |
|
ومن رزؤه ملأ
الخافقين |
|
وان نفد الدهر
لا ينفد |
|
فمن يسأل الطف
عن حاله |
|
يقصّ عليه ولا
يجحد |
|
بأن الحسين
وفتيانه |
|
ظمايا بأكنافه
استشهدوا |
|
أبا حسن يا قوام
الوجود |
|
ويا من به الرسل
قد سددوا |
|
دريت وأنت نزيل
الغري |
|
وفوق السما
قطبها الأمجد |
|
بأن بنيك برغم
العلى |
|
على خطة الخسف
قد بددوا |
|
مضوا بشبا
ماضيات السيوف |
|
وما مُدّ للذلّ
منهم يد |
٢٦١
![أدب الطّف أو شعراء الحسين عليه السلام [ ج ٨ ] أدب الطّف أو شعراء الحسين عليه السلام](/_next/image?url=https%3A%2F%2Flib.rafed.net%2FBooks%2F379_adab-altaff-08%2Fimages%2Fcover-big.jpg&w=640&q=75)

