|
ولأمة كانت الى |
|
ما شاء خالقها
سريعه |
|
وغدت بحق نبيها |
|
في حفظ عترته
مضيعه |
|
جار الظلال بها
و |
|
نور الحق قد
أبدى سطوعه |
|
عصت النبي
وأصبحت |
|
لسواه سامعة
مطيعه |
|
باعت هناك الدين |
|
بالدنيا وخسران
كبيعه |
|
ما كان فيما قد
مضى |
|
اسلامها إلا
خديعه |
|
تحت السقيفة
أضمرت |
|
ما بالطفوف غدت
مذيعه |
|
فلذاك طاوعت
الدعي |
|
وكثرت منه جموعه |
|
بجيوش كفر قد
غدا |
|
ذاك النفاق لها
طليعه |
|
أبني أمية ان
فعلكم |
|
بهم بئس الذريعة |
|
وأبو بنيه وصهره |
|
وأخوه ذو الحكم
البديعه |
|
ووصيه وأمينه |
|
بعد الوفاة على
الشريعه |
|
ما حل مسجده ولا |
|
بيت البتول ولا بقيعه |
|
صبراً أمير
المؤمنين فأ |
|
نت ذو الدرج
الرفيعه |
|
صلة البني اليك
كانت |
|
منهم سبب
القطيعه |
٩٦
![أدب الطّف أو شعراء الحسين عليه السلام [ ج ٣ ] أدب الطّف أو شعراء الحسين عليه السلام](/_next/image?url=https%3A%2F%2Flib.rafed.net%2FBooks%2F361_adab-altaff-03%2Fimages%2Fcover-big.jpg&w=640&q=75)

