صفوان بن ادريس المرسي
|
أمرنة سجعت بعود
أراكِ |
|
قولي مولّهة
علام بكاك |
|
أجفاكِ إلفك أم
بليت بفرقة |
|
أم لاح برق
بالحمى فشجاك |
|
لو كان حقاً ما
ادَّعيت من الجوى |
|
يوماً لما طرق
الجفون كراك |
|
أو كان روّعك
الفراق اذاً لما |
|
صنّت بماء
جفونها عيناك |
|
ولما ألفت الروض
يأرج عرفه |
|
وجعلت بين فروعه
مغناك |
|
ولما اتخذت من
الغصون منصة |
|
ولما بدت مخضوبة
كفاك |
|
ولما ارتديت
الريش برداً معلماً |
|
ونظمت من قزح
سلوك طلاك |
|
لو كنت مثلي ما
أنفت من البكا |
|
لا تحسبي شكواي
من شكواك |
|
إيه حمامة
خبريني ، إنني |
|
أبكي الحسين ،
وأنت ما أبكاك |
|
أبكي قتيل الطف
فرع نبينا |
|
أكرم بفرغ
للنبوّة زاكي |
|
ويل لقوم غادروه
مضرّجاً |
|
بدمائه نضواً
صريع شكاك |
|
متعفّراً قد
مزَّقت أشلاءه |
|
فرياً بكل
مهنَّد فتاك |
|
أيزيد لو راعيت
حرمة جده |
|
لم تقتنص ليث
العرين الشاكي |
|
إذ كنت تصغي إذ
نقرت بثغره |
|
قرعت صماخك أنّه
المسواك |
|
أتروم ويك شفاعة
من جَّده |
|
هيهات ، لا
ومدّبر الأفلاك |
|
ولسوف تنبذ في
جهنم خالداً |
|
ما الله شاء
ولات حين فكاك |
![أدب الطّف أو شعراء الحسين عليه السلام [ ج ٣ ] أدب الطّف أو شعراء الحسين عليه السلام](/_next/image?url=https%3A%2F%2Flib.rafed.net%2FBooks%2F361_adab-altaff-03%2Fimages%2Fcover-big.jpg&w=640&q=75)

