طلايع بن رُزَّيك
|
يا تربة بالطف
جادت |
|
فوقك الديم
الهموعه |
|
وغدا الربيع
مقيدا |
|
في ربعك العافي
ربيعه |
|
حتى يرى الدمن
المروعة |
|
منك مخصبة ضريعه |
|
ولئن أخيف حيا
السحائب |
|
فيك أن يذري
دموعه |
|
وحمتك بارقة
العدى |
|
عن كل بارقة
لموعه |
|
فلقد سقيت من
الروابي |
|
الطهر عن ظمأ
نجيعه |
|
اذ ضيع القوم
الشريعة |
|
فيه لحفظهم
الشريعه |
|
منعت لذيذ الماء
منه |
|
كتائب منهم
منيعه |
|
قد أشرعت صم
القنا |
|
فحمته من ورد
شروعه |
|
غدرت هناك وما
وفت |
|
مضر العراق ولا
ربيعه |
|
لما دعته أجابها |
|
ودعا فما كانت
سميعه |
|
شاع النفاق
بكربلا |
|
فيهم وقالوا :
نحن شيعه |
|
هيهات ساء
صنيعهم |
|
فيها وما عرفوا
الصنيعه |
|
يا فعلة جاؤا
بها |
|
في الغدر فاضحة
شنيعه |
|
خاب الذي أضحى
الحسين |
|
لطول شقوته
صريعه |
|
أفذاك يرجو ان
يكون |
|
محمد أبداً
شفيعه |
|
عجباً لمغرورين
ضيّع |
|
قومهم بهم
الوديعة |
٩٥
![أدب الطّف أو شعراء الحسين عليه السلام [ ج ٣ ] أدب الطّف أو شعراء الحسين عليه السلام](/_next/image?url=https%3A%2F%2Flib.rafed.net%2FBooks%2F361_adab-altaff-03%2Fimages%2Fcover-big.jpg&w=640&q=75)

