على حروف الهجاء.
|
يا أمنا الدنيا
التي لم تزل |
|
أعق من ضب
لاولاده |
|
تستهدف الطفل
وترميه |
|
بالازراء من
ساعة ميلاده |
|
غايتنا الموت
ولا يعرف |
|
الانسان ما حكمة
ايجاده |
|
نحن بنو الارض
وكل امرء |
|
اصداره من عين
ايراده |
|
من جسمه تأخذ
عند البلى |
|
كل الذي اعطته
من زاده |
* * *
|
يا زمني اعطيتني
وردة |
|
ارتاح منها
بالنسيم الشذي |
|
وعدت فاسترجعتها
آخذا |
|
ليتك لم تعط ولم
تأخذ |
|
قذفت بي في
غمرات الاسى |
|
ولجة الوجد فمن
منقذي |
|
أودعتني السجن
وقيدتني |
|
وقلت لي ان
تستطع فانفذ |
|
وهكذا القوة
والضعف والناس |
|
على ناموسها
تحتذي |
* * *
|
أقرة عيني قصمت
القرى |
|
غداة رحلت معا
والكرى |
|
رحلت فاجريت
دمعي دما |
|
وليتك تعلم ماذا
جرى |
|
تحامل جورا علي
الزمان |
|
فاسقط من أفقي
نيرا |
|
ولم يكف حتى سطا
ثانيا |
|
فألحق بالاكبر
الاصغرا |
|
خطوب تمزق صبر
الحليم |
|
وتأمرني بعد أن
أصبرا |
* * *
|
بغداد ما سحرك
عال ولا |
|
ببالغ الذروة في
الافك |
|
لكن رجال الشعب
الوانهم |
|
في حمق تضحك بل
تبكي |
|
خدعتم في الخدع
أمثالكم |
|
فالتأم الحاكي
مع المحكي |
|
دعهم وما جروا
على شعبهم |
|
من قاصمات الظهر
بالضنك |
|
ستنجلي الغبرة
عما جنوا |
|
وخبثهم يظهر
بالسبك |
* * *
|
تحمل ولداننا
للرحيل |
|
ونحن غدا بعدهم
نرحل |
|
أتونا ضيوفا وقد
أبطأوا |
|
ولكن برحلتهم
عجلوا |
|
ثلاث سنين
وكانوا بها |
|
من ابن ثلاثين
هم أكمل |
|
وما أفضل القوم
كبارها |
|
ولكنما الاكبر
الافضل |
|
فدى لهم تالدي
والطريف |
|
لو أن الردى
بالفدا يقبل |
![أدب الطّف أو شعراء الحسين عليه السلام [ ج ١٠ ] أدب الطّف أو شعراء الحسين عليه السلام](/_next/image?url=https%3A%2F%2Flib.rafed.net%2FBooks%2F384_adab-altaff-10%2Fimages%2Fcover-big.jpg&w=640&q=75)

