|
يا فرقد الافق
ومغنى الدجى |
|
في غيهب الليل
عن الفرقد |
|
ما انصفتك الحادثات
التي |
|
شذت فكانت منك
في مرصد |
|
الم تكن أندى
نزار يدا |
|
للرايح الطاوي
وللمغتدي |
|
وقبلها كنت امام
الهدى |
|
وان تنتحيت عن
المقعد |
|
من زحزح الامرة
عن خصبها |
|
فيك. لهذا
الصحصح الاجرد |
|
وما الذي اعتاضت
يد حولت |
|
عنك ولاها. تربت
من يد |
|
اما لديها من
محك به |
|
تميز الصفر عن
العسجد |
|
حادت عن الوبل
الى خلب |
|
لاح بذاك البارق
المرعد |
|
وانقلبت عن صيب
نافع |
|
الى جفاء الحبب
المزبد |
|
لاوجه ملساء ما
قابلت |
|
قارصة العتب
بوجه ندي |
|
تركب متن الحكم
عريانة |
|
من كل مجد طارف
متلد |
|
ان قام منها
للعلى ناهض |
|
قال له لؤم
النجار اقعد |
|
يا لك من مبتزة
امرة |
|
تزوى عن الاقرب
للابعد |
|
فراحت الضلال في
غيهب |
|
تسأل هذا الليل
عن مرشد |
|
وجمرة الوحي خبت
فانبرى |
|
يفحص زند الحق
عن موقد |
|
حالت لهيبا كل
آماله |
|
يا غلة الصديان
لا تبردي |
|
قدنشزت عنك ولود
المنى |
|
فانزع يديها منك
أو فاشدد |
|
كأن سعد الحظ
آلى بأن |
|
لا يصدق الامة
في موعد |
|
تسأله ابيض
ايامها |
|
فزجها في يومها
الاسود |
|
يوم على الامة
تاريخه |
|
يسكب دمع الذل
لم يجمد |
|
مقروحة الاجفان
باتت على |
|
ليلة ذاك العائر
الارمد |
|
اذ قبع الحق على
رغم ما |
|
اسداه في زاوية
المسجد |
|
وامسك الطيش
بأنيابه |
|
على زمام الملك
والمقود |
|
راح يغذى الملك
من حيثما |
|
ينحت جسم العدل
في مبرد |
|
فضاعت الاخلاق
قدسية |
|
وطوح التنكيل
بالسؤدد |
|
وعاد فيء الوحي
العوبة |
|
من ملحد يرمى
الى ملحد |
|
اهواؤهم قدعبثت
بالورى |
|
ما يعبث القدوة
بالمقتدي |
* * *
|
لارعت يا ابن
الوحي في مثلها |
|
من حادثات الزمن
الانكد |
|
ان تسلب البرد
الذي لم يكن |
|
غيرك اهلا فيه
ان يرتدي |
|
فما سوى الصبر
لحكم القضا |
|
لفاقد الناصر
والمنجد |
|
هل تملك الاحرار
رأيا اذا |
|
مالت رقاب الناس
للاعبد |
![أدب الطّف أو شعراء الحسين عليه السلام [ ج ١٠ ] أدب الطّف أو شعراء الحسين عليه السلام](/_next/image?url=https%3A%2F%2Flib.rafed.net%2FBooks%2F384_adab-altaff-10%2Fimages%2Fcover-big.jpg&w=640&q=75)

