|
أي يوم لخاتم
الرسل فلّت |
|
مخذماً فيه شيّد
الاسلاما |
|
وأراقت دماء كل
أبيٍّ |
|
جلّ يوم الهوان
من أن يضاما |
|
يابن بنت النبي
إن فاتني نصر |
|
ك بالكف لم
يفتني كلاما |
|
لي فيه على
عداكم حسام |
|
شفرتاه تحكي
الحمام الزؤاما |
|
مع أني لأخذ
ثارك شوقاً |
|
أرقب المجتبى
الامامَ الهماما |
|
سوف أطفي الغليل
من كاشحيكم |
|
في كفاح تزلزل
الأعلاما |
|
ولدى قائم
الشريعة سيفي |
|
في اللقا يرشح
الدما والحماما |
|
وليوث خلفي لآل
( غريب ) |
|
منهم تغتدي
الليوث سواما |
|
تنشئ الموت في
ظباها إذا ما |
|
أبصرتني للحرب
أبدي ابتساما |
|
يا بن طه اليك
لؤلؤ نظم |
|
فاق في سمطه
اللآلي نظاما |
|
فاقبلن من (
محمد ) ما غدا في |
|
فم قاليك علقماً
وسماما |
|
وبثغر المحب
نحلة شهد |
|
يفضح الشهد
طعمها والمداما |
|
وعليكم من ربكم
صلوات |
|
وسلام يغشى
علاكم دواما |
وله :
|
عذرتك أن تعنفني
نصوحا |
|
وقلبك لم يبت
بأسى جريحا |
|
تفاقم فانطوت
جمل الرزايا |
|
يوازنه فيعدلها
رجيحا |
|
هو الخبر الذي
اتقدت لظاه |
|
بجانحة الهدى
لهباً صريحا |
|
إذا ذبح ابن
فاطمة عناداً |
|
فإن الدين قد
أمسى ذبيحا |
|
وميز رأسه بشبا
العوالي |
|
قطيعاً يعرب
الكلم الفصيحا |
|
يرتل في السنان
لكل واعٍ |
|
كتاب الله
ترتيلاً صحيحا |
|
تمرّ به الرياح
وقد مراها |
|
بأطيب من أريج
المسك ريحا |
|
وجرده إباه
الضيم نفساً |
|
إذا ذكر الهوان
نأت نزوحا |
|
لدى أبناء معركة
وقته |
|
بمهجتها الذوابل
والصفيحا |
![أدب الطّف أو شعراء الحسين عليه السلام [ ج ٨ ] أدب الطّف أو شعراء الحسين عليه السلام](/_next/image?url=https%3A%2F%2Flib.rafed.net%2FBooks%2F379_adab-altaff-08%2Fimages%2Fcover-big.jpg&w=640&q=75)

