|
يا لك الله أيّ
خطب جسيم |
|
جللٌ هوّن
الخطوب الجساما |
|
يوم أذكت عصائب
الشرك بغياً |
|
بحشا صفوة
الجليل أواما |
|
هو فردٌ لكن
تراه الأعادي |
|
حين يسطو بهم
خميساً لُهاما |
|
سامياً صهوة
الطمّر كأن الطر |
|
ف قد قل من هضاب
شماما |
|
ترجف الأرض خيفة
حين يسطو |
|
مثل فلك في لجة
البحر عاما |
|
وتمور السما إذا
شاهدته |
|
سلّ من بأسه
الشديد حساما |
|
لفّ أجنادها
وكّهم منها |
|
البيض قسراً
ونكّس الأعلاما |
|
أسد الله ما رأى
الأسد في |
|
الهيجاء إلا
أعادها أنعاما |
|
بطل أيسر
العزائم منه |
|
إن عدا ساطياً
يروع الحماما |
|
فدعاه المولى
إلى الملأ الأ |
|
على فلبّى طوعاً
وكف احتجاما |
|
ولذاك اختار
الشهادة حتى |
|
نال فيها ما
حيّر الأوهاما |
|
فرمته العدا
بأسهم حقد |
|
ليت قلبي عنه
تلقّى السهاما |
|
فهوى منه في
سماء لويٍ |
|
بدر مجد يجلو
سناه الظلاما |
|
ونعاه الروح
الأمين ونادى |
|
قتل اليوم مَن
به الدين قاما |
|
أي خطب قد هدّ
من كعبة |
|
الاسلام في عرصة
الطفوف دعاما |
|
ورمى آل هاشم
برزايا |
|
نكست من وقوعهن
الهاما |
|
يوم سارت من
العراق عداهم |
|
بنساهم أسرى تؤم
الشئاما |
|
ثاكلات يندبن
حزناً ويذرفن |
|
دموعاً تحكي
السحاب انسجاما |
|
وتجيل الألحاظ
رعباً فلم تلق |
|
سوى كافل يقاسي
السقاما |
|
يا لقومي لفادح
أورث القلب |
|
غليلاً وفيه
أذكى ضراما |
|
يوم ثارت حربٌ
على آل طه |
|
فأبادتهم إماما
إماما |
|
أيّ يوم هالت
عصائب هند |
|
عروة الدين
بالقراع انفصاما |
|
أي يوم جبّت لآل
نزار |
|
بشبا البيض
غارباً وسناما |
![أدب الطّف أو شعراء الحسين عليه السلام [ ج ٨ ] أدب الطّف أو شعراء الحسين عليه السلام](/_next/image?url=https%3A%2F%2Flib.rafed.net%2FBooks%2F379_adab-altaff-08%2Fimages%2Fcover-big.jpg&w=640&q=75)

