|
غيران ينفض
لبدتيه كأنه |
|
اسدُ بآجام
الرماح هصور |
|
ولصوته زجل
الرعود تطير بالأ |
|
لباب دمدمة له
وهدير |
|
قد طار قلب
الجيش خيفة بأسه |
|
وانهاض منه
جناحه المكسور |
|
بأبي أبي الضيم
صال وماله |
|
إلا المثقف
والحسام نصير |
|
وبقلبه الهم
الذي لو بعضه |
|
بثبير لم يثبت
عليه ثبير |
|
حزن على الدين
الحنيف وعربة |
|
وظماً وفقد أحبة
وهجير |
|
حتى إذا نفذ
القضاء وقدّرا |
|
لمحتوم فيه وحتم
المقدور |
|
زجت له الأقدار
سهم منية |
|
فهوى لقى فاندك
منه الطور |
|
وتعطل الفلك
المدار كأنما |
|
هو قطبه وعليه
كان يدور |
|
وهوين ألوية
الشريعة نكصاً |
|
وتعطل التهليل
والتكبير |
|
والشمس ناشرة
الذوائب ثاكل |
|
والأرض ترجف
والسماء تمور |
|
بأبي القتيل
وغسله علق الدما |
|
وعليه من أرج
الثنا كافور |
|
ظمآن يعتلج
الغليل بصدره |
|
وتبلّ للخطيّ
منه صدور |
|
وتحكمت بيض
السيوف بجسمه |
|
ويح السيوف
فحكمهن يجور |
|
وغدت تدوس الخيل
منه أضالعا |
|
سر النبي بطيها
مستور |
|
في فتية قد أرخصوا
لفدائه |
|
أرواح قدس سومهن
خطير |
|
ثاوين قد زهت
الربى بدمائهم |
|
فكأنها نوارها
الممطور |
|
هم فتية خطبوا
العلا بسيوفهم |
|
ولها النفوس
الغاليات مهور |
|
فرحوا وقد نعيت
نفوسهم لهم |
|
فكان لهم ناعي
النفوس بشير |
|
فاستنشقوا النقع
المثار كأنه |
|
ندّ المجامر منه
فاح عبير |
|
واستيقنوا
بالموت نيل مرامهم |
|
فالكل منهم ضاحك
مسرور |
|
فكأنما بيض
الحدود بواسماً |
|
بيض الخدود لها
ابتسمن ثغور |
|
وكأنما سمر
الرماح موائلا |
|
سمر الملاح
يزينهن سفور |
![أدب الطّف أو شعراء الحسين عليه السلام [ ج ٨ ] أدب الطّف أو شعراء الحسين عليه السلام](/_next/image?url=https%3A%2F%2Flib.rafed.net%2FBooks%2F379_adab-altaff-08%2Fimages%2Fcover-big.jpg&w=640&q=75)

