|
وسقى الجرعاء من
بطحآئها |
|
صوب دمعي وسحاب
يتهاما |
|
سلبوا جفني
رقادي بعدما |
|
ألبسوا جسمي
نحولا وسقاما |
|
أطلقوا دمعي
ولكن قيدوا |
|
قلبي المضنى
ولوعاً وغراما |
|
يا وميض البرق
بالله فسل |
|
من ظبآء الحي ان
جزت الخياما |
|
احلال عندهم سفك
دمي |
|
أي شرع حلّلوا
فيه حراما |
|
أن يكن قتلي لهم
فيه رضىً |
|
ما عليهم قَودٌ
فيه إذا ما |
|
انّ للعرب
عهوداً ووفى |
|
ما لهذا العرب
لم يرعوا الذماما |
|
يا لقومي من
لصّبٍ مدنفٍ |
|
قلبه اضحى
كئيباً مستهاما |
|
من ضبى أجفان
أجفان الظبى |
|
كلّ جفن ارهفوا
فيه حساما |
|
ودمىً لو لم تكن
الحاظها |
|
ريشها الهدب لما
كنّ سهاما |
|
يا أهيل الودّ
هل من زورةٍ |
|
بعد ذا البعد
ولو كانت مناما |
|
ليت شعري أنها
وحدي في الهوى |
|
ذو عنىّ أم أن
للصبّ هياما |
|
لا رعى الله
عذولي في الهوى |
|
فلكم أودى
باحشآئى ضراما |
|
أو لا يعلم من
أنّي لم |
|
استمع يوماً من
اللاحي ملاما |
|
ما على الأعمى
بذا من حرج |
|
إنما فيه على
مَن بتعاما |
|
دع ملامي في
الهوى يا لائمي |
|
وذر العذل فذا
العذل إلى ما |
|
لم يمط عني
أعبآء الهوى |
|
غير مدحي خير من
يولي المراما |
|
أحمد الرسل
الميامين ومن |
|
ختم الله به
الرسل الكراما |
|
سيّد الكونين
والهادي الذي |
|
ضلّ من قد حاد
عنه وتَحامى |
|
خير خلق الله من
اضحت لضىً |
|
للورى إذ جآء
برداً وسلاما |
|
خصّ بالبعث
الينا رحمةً |
|
وهدىً عمّ به
الله الاناما |
|
وبشيراً ونذيراً
للورى |
|
وصراطاً
مستقيماً وإماما |
|
علّة الكون
فلولاه لما |
|
خلق الله ضيآء
وظلاما |
![أدب الطّف أو شعراء الحسين عليه السلام [ ج ٥ ] أدب الطّف أو شعراء الحسين عليه السلام](/_next/image?url=https%3A%2F%2Flib.rafed.net%2FBooks%2F367_adab-altaff-05%2Fimages%2Fcover-big.jpg&w=640&q=75)

