|
وعلي زين
العابدين وباقر |
|
علم التقى وجعفر
هو منيتي |
|
والكاظم الميمون
موسى والرضا |
|
علم الهدى عند
النوائب عدتي |
|
ومحمد الهادي
الى سبل الهدى |
|
وعلى المهدي
جعلت ذخيرتي |
|
والعسكريين
الذين بحبهم |
|
أرجو إذا أبصرت
وجه الحجة |
وقال في مدع الأمام علي (ع) :
|
فان يكن آدم من
قبل الورى |
|
بنى وفي جنّة
عدن داره |
|
فان مولاي علياً
ذا العلى |
|
من قبله ساطعة
أنواره |
|
تاب على آدم من
ذنوبه |
|
بخمسة وهو بهم
أجاره |
|
وان يكن نوح بنى
سفينة |
|
تنجيه من سيل
طمى تيّاره |
|
فان مولاي علياً
ذا العلى |
|
سفينة ينجو بها
أنصاره |
|
وان يكون ذو
النون ناجى حوته |
|
في اليمِّ لما
كظه حصاره |
|
ففي جلنرى
للأنام عبرة |
|
يعرفها من دلَّه
اختياره |
|
ردت له الشمس
بأرض بابل |
|
والليل قد تجللت
أستاره |
|
وان يكن موسى
رعى مجتهداً |
|
عشراً الى أن
شفّه انتظاره |
|
وسار بعد ضرّه
بأهله |
|
حتى علت
بالواديين ناره |
|
فان مولاي علياً
ذا العلى |
|
زوّجه واختار
مَن يختاره |
|
وان يكن عيسى له
فضيلة |
|
تدهش من أدهشه
انبهاره |
|
من حملته أمه ما
سجدت |
|
للات بل شغلها
استغفاره |
وقال يذكر فتحه لحصن خيبر :
|
فهزّها فاهتز من
حولهم |
|
حصناً بنوه
حجراً جلمدا |
|
ثم دحا الباب
على نبذة |
|
تمسح خمسين
ذراعاً عددا |
|
وعَبَّر الجيش
على راحته |
|
حيدره الطاهر
لما وردا |
![أدب الطّف أو شعراء الحسين عليه السلام [ ج ٣ ] أدب الطّف أو شعراء الحسين عليه السلام](/_next/image?url=https%3A%2F%2Flib.rafed.net%2FBooks%2F361_adab-altaff-03%2Fimages%2Fcover-big.jpg&w=640&q=75)

