|
ولقد جعلتُ
عليَّ من |
|
نفسي بحبكم
ضمينا |
|
إن الإله
أعزَّني |
|
بكم وأقسم لن
أهونا |
|
وإذا طما بحر |
|
المخاوف كان
ودكُّم سفينا |
|
وأرى يقيني
فيكُم |
|
مستنقذي حقاً
يقينا |
|
أسخنتُ من
أعدائكم |
|
ومن استمال لهم
عيونا |
|
وكسبت من ثقتي
بكم |
|
يا سادتي عزاً
مصونا |
|
وتواترت نعم
الاله |
|
عليَّ أبكاراً
وعونا |
|
لما وردت بهديكم |
|
بين الورى الورد
المعينا |
|
ويسرُّ قلبي أن
وجد |
|
ت على عدوكم
معينا |
|
ما كنت في بغض
لمن |
|
يشنأكم يوماً
ظنينا |
|
وعلى وليكم
بمالي |
|
لم أكن ألفى
ضنينا |
|
ولقد غذيت
ولائكم |
|
مذ كنت مستترا
جنينا |
|
ولقد نظمت لكم |
|
بحور مدامعي
عقداً ثمينا |
|
واذا نصرتكُم
فان الله |
|
خيرُ الناصرينا |
|
ما حدثُ عن حبي
لكم |
|
حاشا وكلا لن
أخونا |
|
يغمى عليَّ اذا
ذكرت |
|
مصابكم حينا
فحينا |
|
ما علَّم النوح
الحمام |
|
سواي والقلب
الحنينا |
|
ما كنت أرضى أن
أكون |
|
لمن يضاددكم
معينا |
|
قد ملت من فرط
الوداد |
|
الى العبيد
المخلصينا |
|
أأكون في الحزب
الشـ |
|
ـمال واترك
الحزب اليمينا |
|
التائبين
العابدين |
|
الصائمين
القائمينا |
|
العالينا
الحافظين |
|
الراكعين
الساجديناً |
|
ولقد عرفت
حقوقكم |
|
وعرفت قوماً
غاصبينا |
|
وجعلت دأبي
ثلبهم |
|
حتى أرى ميتاً
دفينا |
|
يا من اذا نام
الورى |
|
باتوا قياماً
ساهرينا |
![أدب الطّف أو شعراء الحسين عليه السلام [ ج ٣ ] أدب الطّف أو شعراء الحسين عليه السلام](/_next/image?url=https%3A%2F%2Flib.rafed.net%2FBooks%2F361_adab-altaff-03%2Fimages%2Fcover-big.jpg&w=640&q=75)

