|
كنت قبل البين
أشكو صدكم |
|
ثم بنتم فتمنيت
الصدودا |
|
هل لايام النوى
أن تنقضي |
|
ولايام تقضت أن
تعودا |
|
أوقد البين
بقلبي جذوة |
|
كلما هبت صبا
زادت وقودا |
|
عللونا بلقاكم
فالحشا |
|
أوشكت بعد نواكم
أن تبيدا |
|
واذا عن لقلبي
ذكركم |
|
خدد الدمع بخدي
خدودا |
|
ناشدوا ريح
الصبا عن كلفي |
|
انها كانت
لاشواقي بريدا |
|
شد ما كابدت من
يوم النوى |
|
انه كان على
القلب شديدا |
|
أنا ذاك الصب
والعاني الذي |
|
بهواكم لم يزل
صبا عميدا |
|
حدت عن نهج
الوفا يا مي ان |
|
أنا حاولت عن
الحب محيدا |
|
واذا ما أخلق
النأي الهوى |
|
فغرامي ليس ينفك
جديدا |
|
لم يدع بينكم لي
جلدا |
|
ولقد كنت على
الدهر جليدا |
|
من عذيري من هوى
طل دمي |
|
وصدود جرع القلب
صديدا |
|
بي من الاشجان
ما لو أنه |
|
بالجبال الشم
كادت أن تميدا |
|
لو طلبتم لي
مزيدا في الهوى |
|
ما وجدتم فوق ما
في مزيدا |
ومن غرامياته قوله :
|
الى م تسر وجدك
وهو باد |
|
وتلهج بالسلو
وأنت صب |
|
وتخفي فرط حبك
خوف واش |
|
وهل يخفى لاهل
الحب حب |
|
ولولا الحب لم
تك مستهاما |
|
على خديك
للعبرات سكب |
|
وان ناحت على
الاغصان ورق |
|
يحن الى الرصافة
منك قلب |
|
تحن لها وان لحت
اللواحي |
|
وتذكرها وان
غضبوا فتصبو |
|
وتصبو للغوير
وشعب نجد |
|
وغير الصب لا
يصبيه شعب |
|
نعم شب الهوى
بحشاك نارا |
|
وكم للشوق من
نار تشب |
|
تشب ومنزل
الاحباب دادن |
|
فهل هي بعد بعد
الدار تخبو |
|
أجل بان التجلد
يوم بانوا |
|
وأظلم بعدهم شرق
وغرب |
![أدب الطّف أو شعراء الحسين عليه السلام [ ج ٧ ] أدب الطّف أو شعراء الحسين عليه السلام](/_next/image?url=https%3A%2F%2Flib.rafed.net%2FBooks%2F374_adab-altaff-07%2Fimages%2Fcover-big.jpg&w=640&q=75)

