عبد العزيز الجشي
وفاته ١٢٧٠
|
ألا هل لاجفان
سهرن هجود |
|
وهل للدموع
الجاريات جمود |
|
وهل راحل شطت به
غربة النوى |
|
فأوحشني بعد
الفراق يعود |
|
أأسهر ليلي أرقب
النجم فيكم |
|
عشاء وأنتم
بالهناء رقود |
|
وذكرني يوم
انفرادي بينهم |
|
مقاما به سبط
النبي فريد |
|
ألا بأبي أفديه
فردا وقل ما |
|
فديت ولو
بالعالمين أجود |
|
فوالهف نفسي
للقتيل على ظما |
|
وللسمر منه صادر
وورود |
|
فيا عرصات الطف
أي أماجد |
|
سموت بهم
فليهنكن سعود |
|
لئن شرفت أم
القرى بالتي حوت |
|
فأنتن فيكن
الحسين شهيد |
|
وان طاولتكن
المدينة مفخرا |
|
ففيكن أبناء
وتلك جدود |
|
فيا راكبا عيدية
شأت الصبا |
|
تساوى قريب
عندها وبعيد |
|
عداك البلا ، عج
هكذا متنكبا |
|
زرودا وان ألوت
هناك زرود |
|
بني هاشم يا
للحفيظة نكست |
|
على الرغم رايات
لكم وبنود |
|
رمتكم كما شاء
القضاء أمية |
|
ففر طليق بعدها
وطريد |
|
وثارت عليكم بعد
أن طال مكثها |
|
من الرعب أوغاد
لها وحقود |
|
ودع عنك نجوى
أهل مكة وارتحل |
|
فقد عز موجود
وعز وجود |
|
ووجه لتلقاء المدينة
وجهها |
|
مشيحا ففيها عدة
وعديد |
|
ولذ بضريح
المصطفى قائلا له |
|
حسين عن الورد
المباح مذود |
![أدب الطّف أو شعراء الحسين عليه السلام [ ج ٧ ] أدب الطّف أو شعراء الحسين عليه السلام](/_next/image?url=https%3A%2F%2Flib.rafed.net%2FBooks%2F374_adab-altaff-07%2Fimages%2Fcover-big.jpg&w=640&q=75)

