|
لم يكونوا زيناً
لقومهم الغُرّ |
|
ولكن شيناً
طويلاً وعارا |
|
وكأنّي أثنيكم
عن قبيح |
|
بمقالي أزيدكم
إصرارا |
|
قد سمعتم ما قال
فينا رسول |
|
ـله يتلوه مرة
ومرارا |
|
وهو الجاعل
الذين تراخوا |
|
عن هوانا من
قومه كفارا |
|
وإذا ما عصيتم
في ذويه |
|
حال منكم
إقراركم إنكارا |
|
ليس عذر لكم
فيقبله الـ |
|
الله غداً يوم
يقبل الأعذارا |
|
وغررتم بالحلم
عنكم وما زيـ |
|
ـدَ جهول بالحلم
إلا اغترارا |
|
وأخذتم عما جرى
يوم بدر |
|
وحنين فيما
تخالون ثارا |
|
حاشَ لله ما
قطعتم فتيلاً |
|
لا ولا صرتم
بذاك مصارا |
|
إن نور الاسلام
ثاوٍ وما اسطا |
|
عَ رجال أن
يكسفوا الأنوارا |
|
قد ثللنا عروشكم
وطمسنا |
|
بيد الحق تلكم
الآثارا |
|
وطردناكم عن
الكفر |
|
بالله مقاماً
ومنطقاً وديارا |
|
ثم قدناكم إلينا
كما قا |
|
دت رعاة الأنعام
فينا العشارا |
|
كم أطعتم أمراً
لنا واطرحنا |
|
ماتقولون ذلة
واحتقارا |
|
وفضلناكم وما
كنتم قطّ عن |
|
الطائلين إلا
قصارا |
|
كم لنا منكم
جروح رغاب |
|
وجروح لما يكنّ
جبارا |
|
وضِرارٌ لولا
الوصية بالسلـ |
|
ـم وبالحلم خاب
ذاك ضرارا |
|
وادعيتم الى
نزارٍ وأنى |
|
صدقكم بعد أن
فضحتم نزارا |
|
واذا ما الفروع
حدنَ عن الأصـ |
|
ـل بعيدا فما
قربن نجارا |
|
إن قوماً دنوا
إلينا وشبوا |
|
ضَرماً بيننا
لهم وأوارا |
|
ما أرادوا إلا
البوار ولكن |
|
كم حَمى الله
مَن أراد البوارا |
|
فإلى كم
والتجرباتُ شعاري |
|
ودثاري الابس
الاغمار (١) |
|
وبطيئين عن جميل
فإن عنّ |
|
قبيحٌ سعوا له
إحضارا |
__________________
١ ـ الشعار : الثوب الذي يلي البدن ، والدثار فوقه ، والاغمار : الحمقى والجهلاء.
![أدب الطّف أو شعراء الحسين عليه السلام [ ج ٢ ] أدب الطّف أو شعراء الحسين عليه السلام](/_next/image?url=https%3A%2F%2Flib.rafed.net%2FBooks%2F318_adab-altaff-02%2Fimages%2Fcover-big.jpg&w=640&q=75)

