ابن جبر المصري
|
يا دار غادرني
جديد بلاك |
|
رثّ الجديد فهل
رثيت لذاك؟! |
|
أم أنت عما
اشتكيه من الهوى |
|
عجماء منذ عَجَم
البِلى مغناك؟! |
|
ضفناك نستقري الرسوم
فلم نجد |
|
إلا تباريح
الهموم قِراك |
|
ورسيس شوقٍ
تمتري زفراته |
|
عبراتنا حتى
تَبُلّ ثراك |
|
ما بال ربعكِ لا
يبلّ؟ كأنما |
|
يشكو الذي انا
من نحولي شاك |
|
طلّت طلولك دمع
عيني مثلما |
|
سفكت دمي يوم
الرحيل دماك |
|
وارى قتيلك لا
يَديه قاتلٌ |
|
وفتور ألحاظ
الظباء ظُباك |
|
هيّجتِ لي إذ
عجتُ ساكن لوعةٍ |
|
بالساكنيك
تَشُبّها ذكراك |
|
لمّا وقفت
مسلماً وكأنما |
|
ريّا الأحبّة
سقتُ من ريّاك |
|
وكفت عليكِ سماء
عيني صيّباً |
|
لو كفّ صوب
المزن عنك كفاك |
|
سقياً لعهدي
والهوى مقضيّة |
|
أو طاره قبل
احتكام نواك |
|
والعيش غضّ
والشباب مطيّة |
|
للهو غير بطيئة
الادراك |
|
أيام لا واشٍ
يطاع ولا هوى |
|
يُعصى فنقصى عنك
إذ زرناك |
|
وشفيعنا شرخ
الشبيبة كلما |
|
رُمنا القصص من
اقتصاص مهاك |
|
ولئن أصارتك
الخطوب الى بلىً |
|
ولحاك ريبُ
صروفها فمحاك |
|
فلطالما قضّيت
فيك مآربي |
|
وأبحتُ ريعان
الشباب حماك |
![أدب الطّف أو شعراء الحسين عليه السلام [ ج ٢ ] أدب الطّف أو شعراء الحسين عليه السلام](/_next/image?url=https%3A%2F%2Flib.rafed.net%2FBooks%2F318_adab-altaff-02%2Fimages%2Fcover-big.jpg&w=640&q=75)

