|
بنتم وبنّا فما
ابتلّت جوانحنا |
|
شوقاً اليكم وما
جفّت مأقينا |
|
تكاد حين
تناجيكم ضمائرنا |
|
يقضي علينا
الاسى لولا تأسينا |
|
حالت لبعدكم
أيامنا فغدت |
|
سوداً وكانت بكم
بيضاً ليالينا |
|
ليبق عهدكم عهد
السرور فما |
|
كنتم لارواحنا
إلا رياحينا |
|
مَن مبلغ
الملبسينا بانتزاحهم |
|
ثوباً من الحزن
لا يبلى ويبلينا |
|
إن الزمان الذي
قد كان يضحكنا |
|
أنساً بقربكم قد
عاد يبكينا |
|
غيظ العدى من
تساقينا الهوى فدعوا |
|
بان نغصّ فقال
الدهر آمينا |
|
فانحل ما كان
معقوداً بانفسنا |
|
وأنبتّ ما كان
موصولاً بايدينا |
|
بالامس كنا وما
يخضى تفرّقنا |
|
واليوم نحن ولا
يرجى تلاقينا |
|
لا تحسبوا نأيكم
عنا يغيرنا |
|
إذ طالما غيّر
النأي المحبينا |
|
والله ما طلبت
أرواحنا بدلاً |
|
عنكم ولا انصرفت
فيكم أمانينا |
|
لم نعتقد بعدكم
إلا الوفاء لكم |
|
رأياً ولم
نتقلّد غيره دينا |
|
يا روضة طال ما
اجنت لواحظنا |
|
ورداً جلاه
الصبا غضّاً ونسرينا |
|
ويا نسيم الصبا
بلّغ تحيّتنا |
|
مَن لو على
البعد حياً كان يحيينا |
|
لسنا نسمّيك
إجلالاً وتكرمة |
|
وقدرك المعتلي
في ذاك يكفينا |
|
اذا انفردت وما
شوركت في صفة |
|
فحسبنا الوصف
ايضاحا وتبيينا |
|
لم نجف أفق كمال
أنت كوكبه |
|
سالين عنه ولم
نهجره قالينا |
|
عليك منا سلام
الله ما بقيت |
|
صبابة بك تخفيها
فتخفينا |
![أدب الطّف أو شعراء الحسين عليه السلام [ ج ٢ ] أدب الطّف أو شعراء الحسين عليه السلام](/_next/image?url=https%3A%2F%2Flib.rafed.net%2FBooks%2F318_adab-altaff-02%2Fimages%2Fcover-big.jpg&w=640&q=75)

