|
وكل مرفّع في
الجو طاطٍ |
|
ترى أبداً على
كنفيه طاطا (١) |
|
إذا شهد الكريهة
لا يبالي |
|
أشاط على
الصوارم أم أشاطا |
|
وما مد القنا
إلا وخيلت |
|
على آذان خيلهم
قِراطا |
|
وكم نِعَم
لجدّهم عليكم |
|
لقينَ بكم
جحوداً أو غماطا |
|
هُم أتكوا
مرافقكم وأعطوا |
|
جنوبكم النمارقَ
والنماطا |
|
وهم نشطوكم من
كل ذُل |
|
حَللتم وسط
عَقوتِه انتشاطا |
|
وهم سدوا
مخارمكم ومدوا |
|
على شجرات دوحكم
اللياطا |
|
ولولا أنهم
حدبوا عليكم |
|
لما طُلتم ولا
حزتم ضغاطا (٢) |
|
فما جازيتم لهم
جميلاً |
|
ولا أمضيتم لهم
اشتراطا |
|
وكيف جحدتم لهم
حقوقاً |
|
تبين على رقابكم
اختطاطا؟ |
|
وبين ضلوعكم
منهم تراتٌ |
|
كمرخِ القيظِ
أُضرم فاستشاطا |
|
ووتر كلما عمدت
يمين |
|
لرقعِ خروقِه
زدن انعطاطا |
|
فلا نسبٌ لكم
أبداً اليهم |
|
وهل قربى لمن
قطع المناطا؟ |
|
فكم أجرى لنا
عاشور دمعاً |
|
وقطّع من
جوانحنا النياطا |
|
وكم بتنا به
والليل داج |
|
نُميط من الجوى
ما لن يُماطا |
|
يُسقّينا تذكره
سماماً |
|
ويولجنا توجّعه
الوراطا |
|
فلا حديت بكم
أبداً ركابٌ |
|
ولا رُفعت لكم
أبدا سياطا |
|
ولا رفع الزمان
لكم أديماً |
|
ولا ازددتم به
إلا نحطاطا |
|
ولا عرفت رؤوسكم
ارتفاعاً |
|
ولا ألِفت
قلوبكم اغتباطا |
|
ولا غفر الإله
لكم ذنوباً |
|
ولا جُزتم
هنالِكم الصراطا |
__________________
١ ـ الطاط : الشجاع ، والباشق من الطيور.
٢ ـ الضغاط : جمع الضغيطة وهي النبتة الضعيفة.
![أدب الطّف أو شعراء الحسين عليه السلام [ ج ٢ ] أدب الطّف أو شعراء الحسين عليه السلام](/_next/image?url=https%3A%2F%2Flib.rafed.net%2FBooks%2F318_adab-altaff-02%2Fimages%2Fcover-big.jpg&w=640&q=75)

