|
ثم قال اشهدوا
عليّ ومن |
|
أرسلني بالهدى
وحق مبين |
|
خلتُ لما كبا
بأنّ فؤادي |
|
واقع من تحرقي
وشجوني |
|
كيف لو أنّ عينه
عاينته |
|
كابياً في
التراب دامي الجبين |
|
قائلاً ليس في
الأنام ابن بيت |
|
لنبي غيري ألا
فاعرفوني |
|
لهف قلبي له ينادي
الى القوم |
|
على أي بدعةٍ
تقتلوني |
|
يا ذوي البغي
والفسوق أما |
|
أخرجتموني كرهاً
وكاتبتموني |
|
واشتكيتم جور
الطغاة وأقسمتم |
|
إذا قمتُ أنكم
تنصروني |
|
ومضى يقصد
الخيام ودمع العين |
|
منه كاللؤلؤ
المكنون |
|
فاسترابت لذاك
زينب فارتا |
|
عت وقالت له
بخفض ولين |
|
سيدي ما الذي
دهاك أبن لي |
|
يا بن أمي
وناصري ومعيني |
|
قال يا أخت إن
قومي وأهلي |
|
قد تفانوا قتلاً
وقد أوحدوني |
|
وسأمضي وآخذ
الثار ممن |
|
عرفوا موضعي وقد
أنكروني |
|
فاسمعي ما أقول
يا خيرة النسوان |
|
فيما أوصى به
وأحفظيني |
|
لا تشقي جيباً
ولا تلطمي خدا |
|
وان عزك العزا
فاندبيني |
|
وأخلفيني على
بناتي وأوصيك |
|
بزين العباد فهو
أميني |
|
وهو العالم
المشار إليه |
|
صاحب المعجزات
والتبيين |
|
وإذا قمتِ عند
وِردكِ من نا |
|
فلة الليل
دائماً فاذكريني |
|
واعلمي أن جدك
المصطفى والمر |
|
تضى والبتول
ينتظروني |
|
وغدا للقتال
يسطو على الأبطا |
|
ل في حربه كليث
العرين |
|
فرمته الطغاة عن
أسهم الأحقا |
|
د كفراً منهم
بأيدي الضغون |
|
فبرزن الكرائم
الفاطميات |
|
حيارى بزفرة
ورنين |
|
وغدت زينب تنادي
الى أين |
|
رجالي وأين منى
حصوني |
|
ثم تدعو بامها
البضعة الزهراء |
|
يا خيرة النساء
أدركيني |
![أدب الطّف أو شعراء الحسين عليه السلام [ ج ٤ ] أدب الطّف أو شعراء الحسين عليه السلام](/_next/image?url=https%3A%2F%2Flib.rafed.net%2FBooks%2F365_adab-altaff-04%2Fimages%2Fcover-big.jpg&w=640&q=75)

