|
أم كيف لا أبكى
الحسين وقد غدا |
|
شلوا بأرض الطف
وهو ذبيح |
|
والطاهرات حواسر
من حوله |
|
كل تنوح ودمعها
مسفوح |
|
هذي تقول أخي
وهذي والدي |
|
ومن الرزايا
قلبها مقروح |
|
أسفي لذاك الشيب
وهو مضمخ |
|
بدمائه والطبيب
منه يفوح |
|
أسفي لذاك الوجه
من فوق القنا |
|
كالشمس في أفق
السماء يلوح |
|
أسفي لذاك الجسم
وهو مبضعٌ |
|
وبكل جارحة لديه
جروح |
|
ولفاطم تبكي
عليه بحرقة |
|
وتقبل الأشلاء
وهي تصيح |
|
ظلّت تولول
حاسراً مسبية |
|
وسكينة ولهى
عليه تنوح |
|
يا والدي لا كان
يومك انه |
|
باب ليوم مصائبي
مفتوح |
|
أترى نسير الى
الشام مع العدى |
|
أسرى وأنت
بكربلاء طريح |
|
اليوم مات محمد
فبكى له |
|
ذو العزم موسى
والمسيح ونوح |
ومنها قوله من قصيدة
|
طال حزني
واكتئابي |
|
فجعلت النوح
دابي |
|
ما شجاني زاجر
العيس |
|
ولا حادي الركاب |
|
لا ولا شاقتني
الدار |
|
على طول اغتراب |
|
بل شجاني ذكر
مقتـ |
|
ـولٍ عفير في
التراب |
|
نازح الأوطان
ملقى |
|
في ثرى قفر يباب |
|
حرّ قلبي وهو
عاري |
|
الجسم مسلوب
الثياب |
|
حرّ قلبي
والسبايا |
|
في بكاء وانتحاب |
|
يتصارخن سليبات |
|
رداءٍ ونقاب |
|
وبدور التمّ
صرعى |
|
من مشيب وشباب |
|
لست أنسى زينبا |
|
ذات عويل وانتحاب |
![أدب الطّف أو شعراء الحسين عليه السلام [ ج ٤ ] أدب الطّف أو شعراء الحسين عليه السلام](/_next/image?url=https%3A%2F%2Flib.rafed.net%2FBooks%2F365_adab-altaff-04%2Fimages%2Fcover-big.jpg&w=640&q=75)

