|
يا بن الهداة
الأكرمين ومن |
|
شرف الفخار بهم
ولا فخرُ |
|
قسماً بمثواك
الشريف وما |
|
ضمت منى والركن
والحجرُ |
|
فهم سواء في
الجلالة إذ |
|
بهم التمام يحلّ
والقصرُ |
|
تعنو له الألباب
تلبية |
|
ويطوف ظاهر حجره
الحجرُ |
|
ما طائر فقد
الفراخ فلا |
|
يؤويه بعد فراخه
وكرُ |
|
بأشدّ من حزني
عليك ولا |
|
الخنساء جدّد
حزنها صخرُ |
|
ولقد وددت بأن
أراك وقد |
|
قلّ النصير
وفاتك النصرُ |
|
حتّى أكون لك
الفداء كما |
|
كرماً فداك
بنفسه الحرُ |
|
ولئن تفاوت
بيننا زمن |
|
عن نصركم وتقادم
العصرُ |
|
فلا بكيّنك ما
حييت أسى |
|
حتّى يواري
أعظمي القبرُ |
|
ولا منحنّك كل
نادبةٍ |
|
يعنو لنظم
قريضها الشعرُ |
|
أبكار فكري في
محاسنها |
|
نظم وفيض مدامعي
نثرُ |
|
ومصاب يومك يابن
فاطمة |
|
ميعادنا وسلوّنا
الحشرُ |
|
أو فرحة بظهور
قائمكم |
|
فيها لنا
الإقبال والبشرُ |
|
يوماً تردّ
الشمس ضاحيةً |
|
في الغرب ليس
لعرفها نكرُ |
|
وتكبّر الأملاك
مسمعة |
|
إلا لمن في أذنه
وقرُ |
|
ظهر الإمام
العالم العلم |
|
البر التقي
الطاهر الطهرُ |
|
من ركن بيت الله
حاجبه |
|
عيسى المسيح
وأحمد الخضرُ |
|
في جحفل لجبٍ
يكاد بهم |
|
من كثرة يتضايق
القطرُ |
|
فهم النجوم
الزاهرات بدا |
|
في تمّهِ من
بينها البدرُ |
|
عجّل قدومك يابن
فاطمة |
|
قد مسّ شيعة جدك
الضرُ |
|
علماؤهم تحت
الخمول فلا |
|
نفع لأنفسهم ولا
ضرُ |
|
يتظاهرون بغير
ما اعتقدوا |
|
لا قوة لهم ولا
ظهرُ |
![أدب الطّف أو شعراء الحسين عليه السلام [ ج ٤ ] أدب الطّف أو شعراء الحسين عليه السلام](/_next/image?url=https%3A%2F%2Flib.rafed.net%2FBooks%2F365_adab-altaff-04%2Fimages%2Fcover-big.jpg&w=640&q=75)

