|
هذا رسول الله
حسبك في غدٍ |
|
يوم الحساب إذا
الخليل جفاك |
|
ووصيّه الهادي
أبو حسنٍ إذا |
|
أقبلت ظامية
إليه سقاك |
|
فهو المشفّع في
المعاد وخير من |
|
عاقت به بعد
النبي يداك |
|
وهو الذي للدين
بعد خموله |
|
حقاً أراك
فهذّبت آراكِ |
|
لولاه ما عرف
الهدى ونجوتِ من |
|
متضايق الأشراك
والإشراك |
|
هو فلك نوح بين
ممتسك به |
|
ناجٍ ، ومطّرح
مع الهُلاكِ |
|
كم مارقٍ من
مازقٍ قد غادرت |
|
مزقاً حدود
حسامه الفتاك |
|
سل عنه بدراً
حين بادر قاصم |
|
الأملاك قائد
موكب الأملاك |
|
مَن صبّ صوب دم
الوليد ومن ترى |
|
أخلا من الدهم
الحماة حماك؟ |
|
واسئل فوارسها
بأحد مَن ترى |
|
ألقاك وجه الحتف
عند لقاكِ؟ |
|
وأطاح طلحة عند
مشتبك القنا |
|
ولواك قسرا عند
نكسِ لواك؟ |
|
واسئل بخيبر
خابريها مَن ترى |
|
عفّي فناك ومن
أباح فناك؟ |
|
وأذاق مرحبك
الردى وأحلّه |
|
ضيق الشباك وفل
حد شباكِ؟ |
|
واستخبري
الأحزاب لماجرّدت |
|
بيض المذاكي فوق
جرد مذاكي |
|
واستشعرت فرقاً
جموعك إذ غدت |
|
فرقاً وأدبر إذ
قفاك قفاك |
|
قد قلتُ حين
تقدّمته عصابة |
|
جهلوا حقوق
حقيقة الادراك |
|
لا تفرحي فبكثر
ما ستعذبتِ في |
|
أولاك قد عذّبت
في أخراك |
|
يا أمّة نقضت
عهود نبيّها |
|
أفمن إلى نقض
العهود دعاك |
|
وصاك خيراً
بالوصي كأنّما |
|
متعمداً في بغضه
وصّاك |
|
أو لم يقل فيه
النبي مبلّغاً |
|
هذا عليّك في
العلى أعلاك |
|
وأمين وحي الله
بعدي وهو في |
|
إدراك كل قضية
أدراكِ |
|
والمؤثر المتصدق
الوهاب إذ |
|
الهاك في دنياك
جمع لهاك |
|
إياك ان
تتقدّميه فإنه |
|
في حكم كلّ
قضيّة أقضاك |
![أدب الطّف أو شعراء الحسين عليه السلام [ ج ٤ ] أدب الطّف أو شعراء الحسين عليه السلام](/_next/image?url=https%3A%2F%2Flib.rafed.net%2FBooks%2F365_adab-altaff-04%2Fimages%2Fcover-big.jpg&w=640&q=75)

